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आरक्षण एक चिंतन

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समाज की उच्च जातियों ने जिन निम्न जातियों के लोगों को एक षड़यंत्र के तहत हजारों वर्षों तक आगे बढ़ने से रोका, तो आज ये उसी उच्च जति की सामाजिक जिम्मेदारी है की वो खुद कष्ट सहकर दलितों,वंचितों को आगे बढ़ाए .इसी व्यवस्था को दूसरे शब्दों में आरक्षण कहते हैं.आरक्षण हमारे देश में मनु स्मृति जैसे ग्रंथो के साथ ही प्रारम्भ हो गया था.ब्राम्हण को ही पुरोहित,शिक्षक,पुजारी बनने और क्षत्रिय को शासक,सैनिक बनने का १००% आरक्षण था. ये वर्ण की जन्मना प्रथा थी जिसमे शूद्र और पशु के बीच,पशु ही ज्यादा अच्छी स्थिति में था. शूद्र अगर धोखे से वेद वाक्य भी सुन ले तो उसके कानो में गरम सीसा डालने का प्रावधान था.रामायण में शम्बूक प्रसंग इस शोषण का ही एक रूप है.अछूत लोग गांव में घुसने से पहले बाजा बजाके संकेत करते थे की हम आ रहे हैं,उनके पीछे एक झाड़ू बंधी होती थी जिससे उनकी गन्दगी साफ हो सके.वो अपने कंधे में एक डब्बा टांगते थे ताकि उसमे थूक सकें.वो इसका ध्यान रखते थे की उनकी छाया किसी को अपवित्र ना करे इसीलिए केवल दोपहर को ही घर से बाहर निकलते थे जब परछाई सबसे छोटी बनती है.ये सब उनकी उन्हें जबरदस्ती करवाया जाता था.अछूतों के जीवन को जानने के लिए अम्बेडकर जी की जीवनी पढ़के देखिये,आँखों से आंसू बहने लगता है.
आजादी के बाद हमने समानता के साथ साथ समाज के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जिसमे दलित और आदिवासियों को आरक्षण दिया गया.आदिवासी मुख्यधारा के समाज से अलग थे.उनके लिए भारत देश जैसी कोई चीज ना थी.उनका अपना गांव ही उनके लिए देश के सामान था या है.आदिवासियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण दिया गया.उस समय आरक्षण इन वर्गों की स्थिति सुधारने का एक उपकरण था एकमात्र नही.
आज समाज की उच्च जति के लोग ये तर्क देते हैं की उच्च जति में भी तो लोग गरीब हैं,हमारे पूर्वजों के कर्मो की सजा हम क्यों भोगें,हमने तो किसी का शोषण नही किया इत्यादि.आरक्षण उन लोगों के लिए है जिन्हे समाज ने आगे बढ़ने से रोका और इसके कारण वो आजतक गरीब हैं.अगर कोई उच्च जति का व्यक्ति गरीब है तो अपनी गरीबी का दोषी वो खुद है,उसका आलस्य है,उसकी अकर्मण्यता है क्योंकि समाज ने कभी उसे आगे बढ़ने से नही रोका.अगर हम अपने पूर्वजों की संपत्ति,जमीन,घर,सम्मान इत्यादि पूरे हक़ से लेते हैं और उसका आनंद उठाते हैं. तो उनके कुकर्मों का थोड़ा कष्ट हमें सहना ही होगा.ब्राम्हणो को मंदिर के पुजारी बनने या पंडित बनने के लिए लगभग १००% आरक्षण आज भी है.क्या कभी कोई दलित,आदिवासी या महिला शंकराचार्य बन सकती है?
आरक्षण प्रारम्भ में वंचित वर्गों को ऊपर उठाने का एक सामाजिक उपकरण था परन्तु अब तो ये एकमात्र राजनीतिक उपकरण बन चूका है.राजनीतिक वर्ग के लिए आरक्षण ही एकमात्र चुनावी मुद्दा है जिससे आरक्षित वर्ग का विकास हो सकता है.अगर ये सच होता तो आजादी के ६८ वर्षों बाद भी अधिकांश वंचित वर्ग दयनीय गरीबी की स्थिति में नही रहते. इन लोगों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा देनी चाहिए,सामान्य बच्चों की तरह शैक्षणिक माहौल देना चाहिए,स्वास्थ्य की देखभाल होनी चाहिए,पौष्टिक आहार देना चाहिए. वंचित वर्गों के बच्चों को इतनी सुविधा देनी चाहिए जिससे उन्हें आरक्षण की जरूरत ही ना पड़े.
ब्राम्हणवाद एक सोच का नाम है,प्राचीन समय में योग्य ब्राम्हणों ने अपने अयोग्य बच्चों को भी अपने जैसे ही विशेषाधिकार देने के लिए जन्म आधारित वर्ण और जति व्यवस्था का सृजन किया.आज यही सोच आरक्षण प्राप्त करके सरकारी नौकरियों में आए अफसरों,नेताओं,शिक्षकों,डॉक्टरों इत्यादि के मन में भी आ गई है.आखिर उनके बच्चों को अब आरक्षण की कौन सी आवश्यकता है?क्या वे अपना आरक्षण किसी गरीब दलित,आदिवासी के लिए छोड़ नही सकते?आखिर क्यों दलित,आदिवासी आरक्षण में क्रीमी लेयर की कोई व्यवस्था नही है? एक बार जिस परिवार ने आरक्षण का लाभ ले लिया उस परिवार को दोबारा आरक्षण का लाभ नही मिलना चाहिए.ताकि इसके सही हकदारों को इसका लाभ मिल सके.आज भी हमारे गाँव के दलित,आदिवासी दिनभर मजदूरी करते हैं,शाम को उस पैसे से देशी शराब पीते हैं,अन्धविश्वास और त्योहारों में खूब खर्च करते हैं और पांच साल बाद पैसा,कपडा,दारू,जति,धर्म के नाम पर वोट दे देते हैं. ये ६८ साल पहले भी ऐसे ही थे और कुछ नई किया गया तो १००० साल तक ऐसे ही रहेंगे.पुरे भारत की यही तस्वीर है.इससे हमारे नेता भी खुश,अफसर भी खुश. इसी ब्राम्हणवादी सोच को अब ख़त्म करने की जरूरत है.
गुजरात के पटेल या हरियाणा के जाट पिछड़ा बनने की होड़ में लगे हैं, और जिस देश में पिछड़ा बनने की दौड़ लगी हो वो देश आगे कैसे बढ़ सकता है? आज की भारतीय राजनीति में वोट लेने का सबसे अच्छा साधन जति ही है और राजनेता या अभिजन वर्ग इसे और ज्यादा बढ़ाते रहना चाहते हैं.अम्बेडकर जी ने खुद जति प्रथा को नष्ट करने की बात की थी,बढ़ाने की नहीं.आज वक्त की जरूरत है की हमें आरक्षण जैसी नीतियों पर पुनर्विचार करके इसे गरीब वंचित समाज के हित में बदलना होगा. सरकार और समाज को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिससे आने वाली शताब्दियों में आरक्षण की जरूरत ही ना पड़े और हम इसके गुलाम होकर ना रह जाएं. शहीद भगत सिंह ने लिखा था की “जब तक समाज में एक आदमी भी भूखा है तो दोषी वो सब हैं जो खा रहे हैं.भूखे को रोटी का सहारा समाज से मिलना चाहिए”. दलित,आदिवासियों के मुद्दे को भी हमें जातिगत संकीर्णताओं से ऊपर उठकर वृहत परिप्रेक्ष्य में देखना होगा. हर एक वर्ग और जति के विकास के बिना भारत विश्वशक्ति कभी नही बन सकता.



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